PM 2.5 Raises Anaemia Danger In Children Beneath 5: IIT-Delhi Research Claims | PM 2.5 के संपर्क में रहने से 5 साल से कम उम्र के बच्चों में बढ़ता है एनीमिया का खतरा

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मानव स्वास्थ्य पर वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों संबंधी खबरें आए दिन सामने आती रहती हैं. अब, आईआईटी दिल्ली के रिसर्च में हवा में घुले जहरीले सूक्ष्म कण पीएम 2.5 पर चौंकानेवाला खुलासा हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक लंबे समय तक पीएम 2.5 के संपर्क में रहने से 5 साल से कम उम्र के बच्चों को एनीमिया का खतरा बढ़ सकता है.

पीएम 2.5 के सपर्क में रहने से बच्चों में बढ़ता है एनीमिया का खतरा

भारत में पहली बार पीएम 2.5 के संपर्क और 5 साल से कम उम्र के बच्चों के बीच एनीमिया का परीक्षण कर संबंध स्थापित किया गया है. पर्यावरणीय महामारी विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, पीएम 2.5 लेवल में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब की बढ़ोतरी से हीमोग्लोबिन के स्तर में औसत 0.07 ग्राम प्रति डेसिलेटर की कमी होती है. शोधकर्ता डॉक्टर सागनिक डे कहते हैं, “अगर आप दिल्ली बनाम हिमाचल प्रदेश में पीएम 2.5 के बीच अंतर को देखें, तो ये वास्तव में बहुत बड़ी बढ़ोतरी है.

पहली बार पीएम 2.5 और एनीमिया के बीच संबंध किया गया बहाल

राजधानी में 5 साल से कम उम्र के बच्चों का पीएम 2.5 के संपर्क में रहना स्पष्ट रूप से ज्यादा घातक होगा. ये रिसर्च इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी तक एनीमिया को पोषण की कमी के तौर पर देखा गया है, खासकर आयरन की कमी. अगर सरकारी कार्यक्रम जैसे पोषण अभियान को मजबूत किया जाए, वायु प्रदूषण पर रोक लगाई जाए या बच्चों के पीएम 2.5 संपर्क को कम किया जाए, तो एनीमिया का खतरा फिर भी बरकरार रह सकता है.” एनीमिया और पीएम 2.5 में संबंध पर रिसर्च बहुत कम किए गए हैं और ज्यादातर अमेरिका, यूरोप और चीन में किए गए हैं.

डॉक्टर डे ने बताया कि ज्यादातर रिसर्च में व्यस्कों के एनीमिया पर ध्यान दिया गया है. उनका कहना है कि भारतीय रिसर्च के नतीजे पेरू के रिसर्च के नतीजे के बराबर हैं. उन्होंने कहा, “हम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 5 के आनेवाले पूरे नतीजों का इंतजार कर रहे हैं. देखना दिलचस्प होगा कि क्या प्रदूषण में कमी और एनीमिया के बीच संबंध है. उसी तरह उसका राष्ट्रीय पोषण कार्यक्रम पर क्या प्रभाव पड़ा है. एनीमिया और बच्चों के स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम का कैसा असर रहा.” उन्होंने जानकारी दी कि दिल्ली आईआईटी आगे व्यस्कों के एनीमिया पर रिसर्च करेगी.

PM को पार्टिकुलेट मैटर या कण प्रदूषण भी कहा जाता है. ये वातावरण में मौजूद ठोस कणों और तरल बूंदों का मिश्रण है. उसका पता इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की मदद से ही लगाया जा सकता है. सुरक्षित सांस के लिए हवा में PM 2.5 की मात्रा 60 और PM 10 की मात्रा 100 होना जरूरी है. पार्टिकुलेट मैटर का स्तर बढ़ने पर हवा सांस के लिए जहरीली हो जाती है.

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